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जम्मू-कश्मीर का पूर्ण भारतीयकरण अभियान (Absolute Indianisation of Jammu-Kashmir Mission)

अनुच्छेद 370 और इससे पैदा हुई विसंगतियां
     कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देने वाला अनुच्छेद 370, मूल संविधान का भाग नहीं था। श्री नेहरू के कहने पर जब शेख अब्दुल्ला इस प्रावधान को संविधान में शामिल करने के लिए डॉ. अंबेडकर से मिले, तो डॉ. अम्बेडकर ने ऐसा करने से इनकार कर दिया और शेख अब्दुल्ला से कहा कि आप यह चाहते हो कि भारत कश्मीर की रक्षा करें और कश्मीरियों को पूरे भारत में समान अधिकार हो, परन्तु भारत और भारतीयों को आप कोई अधिकार नहीं देना चाहते। मैं भारत का कानून मंत्री हूं और मैं अपने देश के साथ इस प्रकार की धोखाधड़ी और विश्वासघात में शामिल नहीं हो सकता।

     इसके उपरान्त श्री नेहरू के खास मंत्री श्री गोपाल स्वामी आयंगर द्वारा अनुच्छेद 306-ए (अनुच्छेद 370) जोड़ने के लिए संशोधन प्रस्तुत किया गया। संविधान सभा में बहस के दौरान जब मौलाना हसरत मोहानी द्वारा सवाल किया गया कि यह भेदभाव क्यों किया जा रहा है, तो श्री आयंगर ने जवाब दिया कि ऐसा कश्मीर की विशेष परिस्थितियों के कारण है। श्री आयंगर ने यह भी कहा कि भारत सरकार ने कश्मीर को यह भरोसा दिया है कि उसे यह तय करने के लिए जनमत का अवसर दिया जाएगा कि वह भारत के साथ रहेगा या बाहर जाना चाहेगा।

     संविधान में अनुच्छेद 370 को एक अस्थाई प्रावधान के रूप में जोड़ा गया था। यह उम्मीद थी कि संविधान सभा में व्यक्त किए गए कश्मीर में जनमत संग्रह कराने वाले भरोसा को पूरा करके अनुच्छेद 370 को समाप्त कर दिया जाएगा। कश्मीर के उन लोगों के लिए, जो भारत के साथ पूर्ण भारतीय बनकर रहना चाहते हैं, अनुच्छेद 370 की कोई आवश्यकता नहीं रह जाता और ऐसे कश्मीरियों के लिए, जो स्वतंत्र होना चाहते हैं या पाकिस्तान के साथ जाना चाहते हैं, अनुच्छेद 370 अपने-आप निरर्थक हो जाता।

शेख अब्दुल्ला की नियत
      सरदार पटेल जी की 1950 में मृत्यु होने और डॉ. अम्बेडकर एवं श्री श्यामा प्रसाद मुखर्जी द्वारा नेहरू मंत्रिमण्डल से इस्तीफा दे देने के पश्चात श्री नेहरू कश्मीर के सम्बन्ध में निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र और स्वच्छन्द हो गए थे और यही कारण था कि 370 का जो प्रावधान मात्र अस्थाई प्रावधान था, उसे शेख अब्दुल्ला के प्रभाव में 1954 में संविधान-आदेश लाकर स्थाई जैसा कर दिया गया। यह मात्र नेहरू कैबिनेट की एक संस्तुति पर राष्ट्रपति से हस्ताक्षरित आदेश था। इसमें न तो संसद् का विश्वास हासिल था और न ही ऐसा करने के लिए जम्मू एवं लद्दाख के लोगों को विश्वास में लिया गया। 

     1954 के इस प्रशासनिक आदेश के माध्यम से लगभग 122 संविधान-संशोधन करके जम्मू-कश्मीर राज्य पर लागू किया गया है। इनमें से एक 35-ए भी है। इसके कारण संविधान की प्रस्तावना में व्यक्त धर्मनिरपेक्षता, समाजवाद, अखण्डता की अवधारणा जम्मू-कश्मीर पर लागू नहीं होता। यानी पूरा भारत धर्मनिरपेक्ष है किन्तु जम्मू-कश्मीर धर्मनिरपेक्ष राज्य नहीं है। उक्त प्रशासनिक आदेश के कारण दूसरा कोई भारतीय कश्मीर में जाकर बस नहीं सकता है; वहां के शिक्षण-संस्थानों में दाखिला नहीं ले सकता है; वहां पर नौकरी नहीं कर सकता है; वहां सम्पत्ति का अधिकार आज भी मूल अधिकार है, जबकि बाकी राज्यों में ऐसा नहीं है; वहां स्थाई निवास की ऐसी अवधारणा है, जो कश्मीरियों को दोहरी नागरिकता के करीब ले जाता है।

     शेख अब्दुल्लाह की नियत यह था कि भारत से कश्मीर को सुरक्षा भी मिलती रहे और साथ-ही-साथ कश्मीर को पूरी आजादी भी प्राप्त रहे, इतनी आजादी कि वह जम्मू और लद्दाख के क्षेत्र को अपनी तरह से शासित करते रहें। 

     शेख अब्दुल्लाह की उक्त चाहत के मोहरे बने श्री नेहरू। वजह जो भी रहा हो, किन्तु 1954 के इस संविधान आदेश का फल हमारी सेना के जवानों को जब-तब शहादत देकर और हम सभी भारतीयों को अपनी मेहनत की गाढ़ी कमाई से जमा किए गए टैक्स को खर्च करके चुकाना पड़ता है।

        कश्मीर को सुविधा एवं सुरक्षा देने के नाम पर इस देश को अरबों-खरबों रुपए खर्च करना पड़ता है और जब-तब अपनी सेना के जवानों को खोना पड़ता है, यह सवाल पैदा होना स्वाभाविक है कि आखिर यह सब कब तक होता रहेगा और कश्मीर को स्वाभिमान का विषय बनाकर हम कब तक त्याग-पर-त्याग करते रहेंगे? और इसका स्थाई समाधान क्या है?

कश्मीर समस्या का स्थाई समाधान

     जम्मू-कश्मीर राज्य मूलतः तीन खण्डों में विभाजित है। एक जम्मू, दूसरा कश्मीर और तीसरा लद्दाख। लगभग 26 हजार वर्ग किलोमीटर मे फैले जम्मू खण्ड में कुल 10 जिले हैं और यहां की जनसंख्या लगभग 32 लाख है। जबकि लगभग 16 हजार वर्ग किलोमीटर में फैले कश्मीर घाटी खण्ड भी 10 जिले में विभाजित है और यहां की जनसंख्या लगभग 29 लाख है। इसके अलावा 59000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में फैले लद्दाख खण्ड में दो जिला है और यहां की जनसंख्या तीन लाख है।

      किन्तु जनसंख्या में हेराफेरी करके ऐसा परिसीमन किया गया कि कश्मीर क्षेत्र के हिस्से में 46 विधानसभा सदस्य और 3 लोकसभा सदस्य आये जबकि जम्मू क्षेत्र के हिस्से में मात्र 37 विधानसभा सदस्य और दो लोकसभा सदस्य आये और लद्दाख क्षेत्र के हिस्से में 4 विधानसभा सदस्य और एक लोकसभा सदस्य आए। इस विसंगति के कारण विधानसभा में हमेशा कश्मीर क्षेत्र की स्थिति मजबूत रहती है।

     जम्मू और लद्दाख खण्ड को लेकर कोई समस्या नहीं है। यहां के लोग भारत के साथ पूर्ण भारतीय होकर रहना चाहते हैं। अलबत्ता इनकी समस्या यह है कि ये कश्मीर खण्ड स्थित श्रीनगर से शासित ही नहीं होना चाहते हैं। 

     जो कुछ भी समस्या है, वह सिर्फ और सिर्फ कश्मीर घाटी खण्ड में है। यहां पर भी अधिकांश भारत के साथ रहना चाहते हैं। इनके अलावा जो थोड़े बहुत अलगाववादी सोच के लोग हैं, उनके इस सोच का कारण अनुच्छेद 370 है। इसके कारण यहां के कुछ लोग भारत के साथ पूर्ण रूप से जुड़ा हुआ महसूस नहीं कर पाते।

      दुर्भाग्य है कि श्री श्यामा प्रसाद मुखर्जी द्वारा दिये गये नारे 'एक देश-एक संविधान-एक ध्वज' पर सवार होकर सत्ता में आई भाजपा भी इस दिशा में कोई भी सकारात्मक कदम नहीं उठा सकी। यह हो सकता है कि भाजपा सरकार सेना का उपयोग पिछली सरकारों की तुलना में कुछ ज्यादा किया हो। सवाल उठता है कि क्या यह स्थाई समाधान है। यह सवाल उठना स्वाभाविक सी बात है कि भाजपा के मोदी सरकार द्वारा कश्मीर क्षेत्र का भारतीयकरण करने की दिशा में क्या कदम उठाया गया। इसका जवाब कुछ नहीं है। जब तक कश्मीर का भारतीयकरण नहीं किया जाता है, तब तक हम अपने जवानों को ऐसे ही खोते रहेंगे। भले ही हम इनके पीछे अरबों खरबों रुपए बहाते रहे।

     1954 का संविधान आदेश कैबिनेट के परामर्श पर राष्ट्रपति द्वारा जारी किया गया है। इसे संसद से पारित नहीं किया गया था। इसको समाप्त करने या इसमें संशोधन करने का अधिकार मोदी सरकार की कैबिनेट को है। इसलिए कम से कम 1954 के आदेश को समाप्त करने के विषय पर राज्यसभा में बहुमत नही होने का बहाना भी नहीं बनाया जा सकता। सवाल उठेगा कि मोदी सरकार इस दिशा में अपनी राजनीतिक इच्छाशक्ति का प्रयोग क्यों नहीं कर पा रही है।

      अनुच्छेद 370 के खंड (3) के अंतर्गत राष्ट्रपति नोटिफिकेशन जारी करके इस प्रावधान को ही समाप्त कर सकता है किंतु केवल एक शर्त यह है कि जम्मू कश्मीर के संविधान सभा द्वारा इसके लिए संस्तुति किया गया हो। इसका भी रास्ता निकाला जा सकता है। आज जम्मू कश्मीर में कोई संविधान सभा का अस्तित्व नहीं है। इसका स्थान विधानसभा ने ले लिया है। यदि राष्ट्रपति-शासन लागू बना रहता है, तो अनुच्छेद 356 के अंतर्गत विधानसभा के शक्ति का प्रयोग संसद् खुद कर सकती है।

      हां, एक बात का बहाना बनाया जा सकता है कि अनुच्छेद 35ए को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दिया गया है। किंतु इस कारण से आपको अपनी इच्छाशक्ति दिखाने पर रोक नहींं है और एक आदेश करके आप इसे समाप्त कर सकते थे। एक समस्या राज्य सरकार की सहमति को लेकर आ सकता है। इसके लिए भी आज, जब राष्ट्रपति शासन है, से अनुकूल कोई समय नहीं हो सकता है और आप समाप्त करने की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं।

       आज भी कश्मीरी पंडित अपने मूल निवास को पाने से वंचित हैं। बाल्मीकि समाज अपने मूलभूत अधिकारों से वंचित है। वह कितना भी पढ़ लिख लें, लेकिन उसे सफाईकर्मी का ही काम करना है। वे विधानसभा चुनाव के लिए मत भी नहीं दे सकते। कश्मीरी पंडितों, बाल्मिकी समुदाय की पीड़ा का कारण भी कश्मीर का भारतीयकरण न हो पाना ही है। कश्मीर क्षेत्र का पूर्ण भारतीयकरण करने के संकल्प को पूरा करना ही श्री श्यामा प्रसाद मुखर्जी जी एवं अमर शहीदों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

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