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भौमिक समानता हेतु 'गांधीत्व-भीमत्व-भावेत्व नीति' क्रियान्यवयन (Execution of Gandhiship-Bhimship-Bhaveship Policy for Land Equality)

भौमिक समानता के लिए "गांधीत्व- भीमत्व-भावेत्व नीति" -
      आज देश में मात्र 1% भारतीयों के पास देश की 58% संपत्ति है। यानी 99% लोगों के पास देश की मात्र 42% संपत्ति रहती है। हाल ही में 21 जनवरी 2019 को जारी किए गए एक रिपोर्ट के अनुसार भारत के शीर्ष 9 अमीरों की संपत्ति देश की 50% गरीब जनसंख्या की कुल संपत्ति के बराबर है।
    1950 में संविधान लागू कर समानता का लक्ष्य हासिल करने के संकल्प को लेकर आगे बढ़ने वाले भारत देश के लिए 68 वर्ष बाद यह स्थिति चिंतन एवं चिंता का विषय है। यह मात्र आर्थिक असमानता की बात नहीं रह जाती है। आर्थिक असमानता के बहुत आगे यह आर्थिक अराजकता की स्थिति है।
     आर्थिक अराजकता की इस स्थिति को समाप्त करने के लिए 'राष्ट्रीय स्वराज परिषद (रा.स्व.प.) गांधीत्व-भीमत्व-भावेत्व नीति को लागू करने की वकालत करता है। यह नीति राष्ट्रजनक महात्मा गांधी के 'ट्रस्टीशिप का सिद्धांत'; राष्ट्रनिर्माता डां. अंबेडकर की समान भूमि वितरण पर आधारित 'भौमिक सीमा का सिद्धांत'; और संत विनोबा भावे की 'आधिक्य भूमि के दान का विचार' का एकीकृत स्वरूप है।
    इस देश के पास कितनी भूमि है यह निश्चित है। इस भूक्षमता को ध्यान में रखकर एक राष्ट्रीय भौमिक नीति बनाई जानी चाहिए। इस नीति के अन्तर्गत वन भूमि, जलमग्न भूमि, कृषि भूमि, औद्योगिक भूमि एवं सार्वजनिक भूमि के अलावा बचे आवासीय भूमि के सम्बन्ध में 'प्रति नागरिक आवासीय भूसम्पदा सीमा' तय करके यह व्यवस्था बनायी जाये कि कोई भी नागरिक इस सीमा के अधीन भूमि का व्यक्तिगत-स्वामित्व (जिसे डां. अम्बेडकर के सम्मान में 'भीमत्व' कहना उचित है) हासिल सकता है।
    यदि किसी व्यक्ति में उक्त सीमा से अधिक भूमि हासिल करने की क्षमता है, तो उसे ऐसा करने की छूट होगी, किन्तु इस सीमा के बाद अर्जित की गई भूसम्पदा का वह न्यास-स्वामित्व (जिसे महात्मा गांधी के सम्मान में 'गांधीत्व' कहना उचित है) धारण कर सकता है। इस नीति के अन्तर्गत कृषि-भूमि एवं औद्योगिक-भूमि के सम्बन्ध में कोई व्यक्ति 'गांधीत्व' ही धारण कर सकता है।
    गांधीत्व एवं भीमत्व स्वामित्व-अर्जन के स्वरूप हैं। यह संभव है कि कोई व्यक्ति अपनी संपत्ति को या उसके किसी अंश को इन दोनों स्वरूपों में नहीं रखना चाहे, बल्कि इसे वह राज्य के माध्यम से दान करना चाहता है। यह स्वामित्व-अर्जन के बाद स्वामित्व-दान की पवित्र स्थिति है।
    आप जो कुछ भी अर्जित करते हैं, उसे आप अपनी क्षमता का प्रयोग कर इसी समाज से प्राप्त करते हैं। इसे अपने और अपनी पीढ़ी तक सीमित रखना उचित नहीं है। संत विनोबा भावे जी लोगों से कहते थे कि आपके पास यदि दो बच्चे हैं तो अपनी संपत्ति का बंटवारा करते समय आप तीन हिस्सा लगाइए और इसमें से एक हिस्सा समाज को दे दीजिए।
     14 वर्ष निरन्तर पैदल यात्रा करके इस संत ने धनी लोगों से भूमि प्राप्त कर भूमिहीन लोगों के बीच बांटने का आन्दोलन चलाया। इस तरह लगभग 50 एकड़ भूमि प्राप्तकर भूमिहीन लोगों को बांटा गया। यह स्वेच्छा से सक्षम लोगों द्वारा अपनी भूमि के स्वामित्व का किया गया त्याग है, ताकि उनके पास भी भूमि हो, जो इससे वंचित रह गए हैं।
     एक भूमिहीन व्यक्ति को दान में मिलने वाली इस भूमि का वह सामाजिक स्वामित्व (जिसे संत विनोबा भावे के सम्मान में 'भावेत्व' कहना उचित है) प्राप्त करेगा। 'भावेत्व' की अवधारणा किसी समाज में संतुलन बनाने के लिए आवश्यक है। आप अपने जीवन की यात्रा में समाज एवं देश को ऐसा कुछ देते हैं, जिसे पीढ़ी के अलावा पूरा समाज याद रखेगा।
     भौमिक सम्पत्ति के सम्बन्ध में 'गांधीत्व-भीमत्व-भावेत्व' की नीति को दूसरे तरह की चल सम्पत्तियों के सम्बन्ध में भी लागू किया जा सकता है। यह आवश्यक नहीं है कि यह नीति शासन के स्तर से ही लागू किया जाय। स्वप्रेरणा से हम 'गांधीत्व-भीमत्व-भावेत्व नीति' के सहभागी बन सकते हैं। 'राष्ट्रीय स्वराज परिषद' इस नीति को स्वयं आत्मसात करने की अपील करता है।