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कृषि का राष्ट्रीयकरण अभियान (Nationalisation of Agriculture Mission)

आज देश में सबसे अधिक विकट एवं दुखदाई स्थिति में जीवन-बसर करने वाले छोटे एवं मध्यम वर्ग के किसान हैं। अन्नदाता कहा जाने वाला किसान आज जहां कर्ज के कारण आत्महत्या करने के लिए मजबूर हैं, तो उसके आश्रित बच्चे अन्न के बिना कुपोषण एवं भूखमरी का शिकार होते रहने के लिए अभिशापित हैं।
      कर्ज के कारण किसानों द्वारा की जाने वाली आत्महत्या और कुपोषण एवं भूख के कारण इनके बच्चों की होने वाली मौत किसी भी सभ्य समाज एवं देश के लिए शर्मसार होने वाली बात है।
     कृषि पर ही सम्पूर्ण राष्ट्र की गति एवं प्रगति निर्भर रहता है। कृषियोग्य भू-सम्पत्ति का अधिक से अधिक सदुपयोग व कृषि-उत्पादन राष्ट्रहित से जुड़ा विषय है। इसे हम किसानों की निजी क्षमता, कौशल या स्वेच्छाचार के भरोसे नहीं छोड़ सकते हैं। हम यह नहीं कह सकते हैं कि किसान अपनी इच्छानुसार व क्षमतानुसार या तो भूमि को जोते-बोये या परती छोड़ दे। खेत को अच्छे से जोतने-बोने या किसी कारण इसे परती  छोड़ देने का सीधा प्रभाव देश की प्रगति पर पड़ता है।
     किन्तु आजादी के बाद हमने कृषि को किसान की निजी क्षमता का विषय बनाने की नीति अपनायी। सबसे बड़ी विडंबना यह है कि उत्पादन के पूर्व होने वाले सभी कृषि कार्य को तो हम किसानों का निजी विषय बनाये हुए हैं, जबकि कृषि उत्पादन यानी अनाज को राष्ट्रहित का विषय मानते हैं। कृषि कार्य के सन्दर्भ में किसानों को निजी रूप से उत्तरदायी बनाने के कारण ही उसे कर्ज की दलदल में फसना पड़ता है। कभी स्थानीय साहूकारों से कर्ज़ लेकर तो कभी सहकारी संस्थाओं एवं बैंक से कर्ज लेकर।
     समय-समय पर कर्जमाफी देकर हमारे नीति-निर्माता चुनावी लालीपाप देते रहते हैं। किंतु इसका स्थायी समाधान कर्जमाफी नहीं, बल्कि 'कृषि का राष्ट्रीयकरण' है। हमने बैंक के राष्ट्रीयकरण को तो वरीयता दी, किंतु कृषि का राष्ट्रीयकरण न करके हमने देश के किसानों को उनकी स्थिति पर छोड़ दिया। कृषि को किसानों की निजी क्षमता का विषय नहीं बनाया जा सकता। आत्महत्या और भूखमरी की स्थिति को नियंत्रित करने और कृषि भूमि का सम्पूर्ण उपयोग करने का एक ही रास्ता है- कृषि का राष्ट्रीयकरण।
   राष्ट्रीय स्वराज परिषद (रा.स्व.प.) 'कृषि का राष्ट्रीयकरण अभियान' के माध्यम से कृषि का राष्ट्रीयकरण करने का आन्दोलन चला रहा है। इसके अंतर्गत-
(क). 'राष्ट्रीय कृषि नियामक आयोग' का गठन कर इसके माध्यम से किसानों को कृषि-कार्य प्रशिक्षण प्रदान किया जायेगा;
(ख). प्रशिक्षित किसान को रोजगारपरक बनाकर और प्रति महीने वेतन भुगतान करके कृषि-वैज्ञानिकों की देखरेख में कृषि-कार्य होगा;
(ग). आयोग कृषि भूस्वामियों से उनकी भूमि का पट्टा लेकर इस भूमि पर कृषिकार्य करायेगा और कृषि-पट्टा के बदले भूमि के क्षेत्रफल एवं मालियत के सापेक्ष भूस्वामी को प्रति महीने वृत्तिका का भुगतान किया जायेगा;
(घ). प्रतिकूल मौसम के कारण होने वाला जोखिम आयोग द्वारा उठाया जायेगा;
(ड). अनाज एवं अन्य उत्पादों के रखरखाव और विक्रय की जिम्मेदारी आयोग की होगी।