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लक्ष्य प्राप्ति, आरक्षण समाप्ति आन्दोलन (Achieve Object, Abolish Reservation Movement)

आज आरक्षण को जानबूझकर गतिशील होने से रोक दिया गया है। जिस आरक्षण को 70 वर्ष बाद आज लक्ष्य प्राप्त करने व समाप्त होने की तरफ बढ़ना चाहिए था, उसे स्थिर एवं अखण्ड बनाया जा रहा है। ऐसा प्रयास दोनों तरफ के हितबद्ध लोगों द्वारा किया जा रहा है। 

      उच्चतर न्यायिक एवं विश्वविद्यालयी संस्थानों में सवर्ण वर्ग का कुलीन उपवर्ग अपना वर्चस्व बनाये हुए रहता है। यह कुलीन उपवर्ग मेरिट की दुहाई देकर यहां आरक्षण सफल नहीं होने देना चाहता। किन्तु इसका खामियाजा आम सवर्णों को दो स्तर पर भुगतना होता है। पहला यह कि वह इन इन कुलीन उपवर्ग के सामने असहाय रहता है व इन उच्चतर संस्थानों में कहीं आसपास भटकने भी नहीं पाता है और दूसरा यह कि वह बदनाम रहता है कि इन संस्थानों में सवर्णों का वर्चस्व बना हुआ है और इस कारण आरक्षण समाप्त करने का उनका दावा कमजोर रहता है।

      इसी के समानांतर पिछड़े वर्ग में भी आरक्षण का लाभ लेकर एक समृद्ध उपवर्ग पैदा हो गया है। यह नवनिर्मित समृद्ध उपवर्ग भी आरक्षण के वर्तमान स्वरूप को स्थिर बनाए रखने का हिमायती रहता है, ताकि उसके बच्चे ही मध्यम व छोटे किस्म की नौकरी पाते रहे। आम पिछड़े वर्ग के बच्चे इन समृद्ध उपवर्ग के बच्चों के आगे असहाय रहते हैं।

      इन दोनों तरह के कुलीन एवं समृद्ध उपवर्गों में एक अपवित्र गठबन्धन बन गया है। ये दोनों एक-दूसरे के लिए ढाल का काम करते हैं। ये कदापि नहीं चाहते हैं कि आरक्षण अपने लक्ष्य को जल्द-से-जल्द प्राप्त करे और इसे समाप्त किया जाय। इसके कारण सबसे अधिक नुकसान आम युवाओं को भुगतना होता है, चाहे वह सवर्ण वर्ग के हों या पिछड़ा या दलित वर्ग के।

      कुलीन एवं समृद्ध उपवर्गों के इस अपवित्र गठबन्धन को तोड़ने का दायित्व आम युवाओं का है। सवर्ण वर्ग के आम युवाओं का दायित्व है कि वह इसकी निगरानी करे कि उसके हक को मारकर आरक्षण की जो व्यवस्था लागू की गई है, वह अपने लक्ष्य को जल्द-से-जल्द प्राप्त करे, ताकि इसे समाप्त किया जा सके। इसी तरह पिछड़े एवं दलित वर्ग के आम युवाओं का भी यह देखने का दायित्व है कि उसके आरक्षण के हक को नवनिर्मित समृद्ध उपवर्ग हड़पने न पाये।

     डॉ. अंबेडकर एवं अन्य संविधान निर्माताओं की इच्छा थी कि जल्द ही समानता के लक्ष्य को प्राप्त कर आरक्षण की व्यवस्था समाप्त कर दिया जाएगा। जातियों को राष्ट्र विरोधी बताते हुए डॉ. आंबेडकर ने कहा था कि ये सामाजिक जीवन में भेद लाती हैं और परस्पर ईर्ष्या और द्वेष पैदा करती हैं। यदि हमें वास्तव में एक राष्ट्र होना है तो इन कठिनाइयों पर विजय प्राप्त करना होगा। 

     किन्तु दुर्भाग्य से आज आरक्षण व्यवस्था जातीय स्थिरता एवं जातीय जटिलता का कारण बनता जा रहा है। यह ऐसा एण्टीबायोटिक दवा बन गया है जिसका दुष्प्रभाव बीमारी से भी ज्यादा खतरनाक है। आरक्षण रूपी दवा का दुष्प्रभाव समाज रूपी शरीर के लिए नुकसानदायक न होने पाए, इसका भी ध्यान रखना ही होगा।

      मोदी सरकार द्वारा आर्थिक आधार पर 10% आरक्षण की व्यवस्था लागू किया गया है। यह सैद्धान्तिक एवं व्यवहारिक दोनों दृष्टियों से खतरनाक है। यह जातीय भेदभाव को स्थिर एवं जातीय अलगाव को मजबूत तो करेगा ही, साथ ही आरक्षण के अपवाद होने की मान्यता को समाप्त कर इसे सामान्य नियम बना देता है। 

     गलत आरक्षण नीति के कारण देश की युवा पीढ़ी अन्याय की शिकार न होने पाए, इसके लिए राष्ट्रीय स्वराज परिषद द्वारा 'लक्ष्य प्राप्ति, आरक्षण समाप्ति आन्दोलन' चलाया जा रहा है। इस आन्दोलन के माध्यम से 'सर्वक्षेत्र आरक्षण स्वीकृति नीति'; 'एक बार आरक्षण, फिर नहीं आरक्षण नीति'; और 'न्यूनतम हैसियत निस्यन्दन की नीति' को लागू करने की वकालत करता है, ताकि आरक्षण के लक्ष्य को जल्द-से-जल्द एक समय सीमा के भीतर हासिल कर समाप्त किया जा सके।

1. 'सर्वक्षेत्र आरक्षण स्वीकृति नीति' के अंतर्गत- देश के विश्वविद्यालयों एवं उच्च शिक्षण संस्थाओं में आरक्षण की व्यवस्था को अखिल भारतीय स्तर पर इकाई बनाकर लागू किया जाए। इसी तरह उच्च न्यायालय एवं उच्चतम न्यायालय में भी आरक्षण को अखिल भारतीय इकाई बनाकर लागू किया जाय।

      यह नीति 25 वर्ष के लिए (या अन्य किसी निश्चित अवधि के लिए) इस शर्त के साथ लागू होगा कि दूसरे क्षेत्रों के संदर्भ में भी आरक्षण और जाति प्रमाण पत्र जारी करने की व्यवस्था इस अवधि के बाद समाप्त कर दिया जाएगा।

2. 'एक बार आरक्षण, फिर नहीं आरक्षण नीति' के अंतर्गत- जिस भी व्यक्ति को एक बार आरक्षण का लाभ प्राप्त हो जाय, उसे या उसके परिवार के सदस्य को आरक्षण का लाभ दोबारा नहीं मिलेगा, ताकि उसी वर्ग के दूसरे लोगों को आरक्षण का लाभ मिल सके।

3. 'न्यूनतम हैसियत निस्यन्दन की नीति' के अंतर्गत- अपनी क्षमता के आधार पर एक निश्चित न्यूनतम आय अर्जित करने वाले या एक निश्चित स्तर की प्रतिष्ठा का पद धारण करने वाले या न्यूनतम क्षेत्रफल से अधिक भूमि का स्वामित्व अर्जित करने वाले या इनमें से कोई एक हैसियत रखने वाले व्यक्ति को छांटकर आरक्षण नीति से बाहर कर दिया जाएगा।

     इसी के साथ यदि 'शिक्षा का राष्ट्रीयकरण'; 'कृषि का राष्ट्रीयकरण' और भौमिक समानता के लिए 'गांधीत्व-भीमत्व-भावेत्व नीति' को लागू कर दे, (जिसके लिए भी राष्ट्रीय स्वराज परिषद अभियान चला रहा है) तो आरक्षण लागू करने का आधा कारण अपने-आप ही समाप्त हो जायेगा।