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सर्वोदय भारतीय भाषा मुहिम (Sarvodaya Bharatiya Bhasha Muhim)

किसी देश के निर्माण में और उसकी एकता व अखण्डता को अक्षुण्ण बनाए रखने में उस देश की भाषा अर्थात राष्ट्रभाषा का बहुत योगदान होता है। भारत देश के लिए विडम्बना यह है कि अभी तक इसका कोई घोषित राष्ट्रभाषा नहीं है। 
    हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने की वकालत करते हुए राष्ट्रजनक महात्मा गांधी कहते हैं कि 'स्वराज अंग्रेजी बोलने वाले भारतीयों का, उन्हीं के लिए होने वाला हो तो, निसंदेह अंग्रेजी ही राष्ट्रभाषा होगी। लेकिन यदि स्वराज करोड़ों भूखे, निरक्षर, दलित और अन्त्यजों के लिए होने वाला हो, तो हिन्दी ही एकमात्र भाषा है, जो राष्ट्रभाषा हो सकती है।' इसे न केवल अधिसंख्य लोग बोलते हैं और सीखने में सुगम है, बल्कि इस भाषा में भारत का आपसी धार्मिक, आर्थिक एवं राजनीतिक व्यवहार होना संभव है। 
     दूसरे भारतीय भाषाओं की स्थिति का जिक्र करते हुए महात्मा गांधी आगे कहते हैं कि हिन्दी को राष्ट्रभाषा के रूप में स्वीकार करने का मतलब यह नहीं है कि हम दूसरे प्रांतीय भाषाओं को मिटाना चाहते हैं। हमारा मतलब तो सिर्फ यह है कि प्रांतों के पारस्परिक संबंध के लिए हिन्दी सीखें।
    संविधान सभा में भी हिन्दी भाषा को राष्ट्रभाषा के रूप में स्थापित करने को लेकर आम सहमति थी। किंतु एक धारा ऐसी भी थी, जो मैंकालियन विचार से प्रभावित था। अपने आरंभिक दौर में जब संविधान सभा अपने अस्तित्व को लेकर जूझ रहा था, ऐसे समय में श्री जवाहर लाल नेहरू द्वारा 8 नवंबर 1948 को भाषा आधारित प्रांतों के पुनर्गठन का सवाल उठाया जाना इसी धारा का उदाहरण है। वह सर्व-भारत-भाषा के नाम पर अंग्रेजी को स्थापित करने की वकालत कर रहे थे।
      यद्यपि श्री नेहरू द्वारा व्यक्त उक्त विचार का विरोध श्रीमती रेणुका राय एवं श्री मोटुरी सत्यनारायण द्वारा किया गया था, बावजूद इसके श्री नेहरू के उक्त भाषण ने उस पौधे का बीजारोपण कर दिया था, जो तमिलनाडु जैसे राज्यों में हिन्दी का विरोध करने का कारण बना। 
    किन्तु एक धारा ऐसा भी था, जो भाषा आधारित प्रांतों के गठन को राष्ट्रीय एकता के लिए खतरा मानता था। ऐसे खतरे से सावधान करते हुए डॉ अम्बेडकर कहते हैं- प्रत्येक प्रान्तों की भाषा को इनके आधिकारिक भाषा के साथ भाषावाद प्रांतों के गठन से प्रांतीय राष्ट्रीयता पैदा होने के खतरे हैं। इससे प्रांतीय संस्कृति पृथक, कठोर एवं मजबूत बनता है। एक भाषा लोगों को एकत्रित करता है। चूंकि भारतीय लोग एकत्रित होना चाहते हैं और एक साझा संस्कृति बनाना चाहते हैं, इसलिए सभी भारतीयों का दायित्व है कि वह हिन्दी को अपनी भाषा माने।
     13 सितंबर 1949 को संविधान सभा में दिए गए अपने भाषण में डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी कहते हैं 'जब हम हिन्दी को स्वीकार कर रहे हैं, तो हिन्दी भाषी प्रांत अपने ऊपर बड़ी जिम्मेदारी ले रहे हैं। उम्मीद है कि वे हिन्दी साहित्य सम्मेलन के उस प्रस्ताव को आगे बढ़ाएंगे, जिसमें कहा गया है कि सभी हिन्दी भाषी प्रांत एक या एक से ज्यादा दूसरी भारतीय भाषाओं के अध्ययन की बाध्यकारी व्यवस्था लागू करेंगे।
     यदि आज इस देश में आर्थिक अराजकता की स्थिति इस स्तर पर पहुंच गया है कि मात्र 1% भारतीयों के पास देश की 58% संपत्ति है और आर्थिक असमानता की खाई लगातार चौड़ा होता जा रहा है, तो इसका एक महत्वपूर्ण कारण आम लोगों के मातृभाषा की उपेक्षा और सरकारी एवं उच्चतर स्तर पर अंग्रेजी का अनावश्यक महिमामण्डन किया जाना है।
     अंग्रेजी न जानना अयोग्यता हो गया है और मात्र इसी कारण से कई मेधावी युवा प्रतियोगिता से बाहर और विकास से वंचित रह जाते हैं। 70 वर्ष बाद भी अंग्रेजी का वर्चस्व बने रहना वर्गभेद का भी कारण है। इसलिए न केवल देश की एकता और अखण्डता की दृष्टि से, बल्कि वास्तविक स्वराज लाने और अंतिम व्यक्ति तक विकास पहुंचाने की दृष्टि से हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाए जाने की आवश्यकता है।
     जिस एक बात के लिए वर्तमान प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी को 100 में से 100 अंक मिलना चाहिए, वह है हिन्दी जैसी भारतीय भाषा को प्रत्येक स्तर पर स्थापित करना। चाहे वैश्विक मंच हो या राष्ट्रीय मंच, एक गुजराती मातृ भाषा वाले प्रधानमन्त्री श्री नरेंद्र मोदी द्वारा अंग्रेजी जैसी सामंतवादी भाषा का सहारा लिए बिना हिन्दी को आपसी संवाद एवं भाषण का माध्यम बनाए जाने के बहुत खास मायने हैं। 
     एक तमिल भाषी या कन्नड़ भाषी या मलयालम भाषा या मराठी भाषा या उड़िया भाषी या बांग्ला भाषी या आसामी भाषी, जब वह अंतर्राष्ट्रीय मंच पर अपने गुजराती भाषी प्रधानमंत्री को हिन्दी भाषा में भाषण देते हुए देखता है, तो इसका प्रभाव उसके दिलो-दिमाग पर पड़ता है। श्री मोदी का यह व्यवहार अंग्रेजी न जानने के कारण हीनभावना से ग्रसित आम भारतीयों के इस मिथक को तोड़ता है कि वे अंतर्राष्ट्रीय स्तर के बड़े काम करने लायक नहीं हैं। 
     एक प्रधानमन्त्री का यह कृतित्व उन लोगों को अपनी सोच बदलने के लिए मजबूर करता है जो अंग्रेजी भाषा को सिर्फ इसलिए पसन्द करते हैं क्योंकि इसे बड़े लोगों की भाषा कहा जाता है और इसे सामंतवादी भाषा होने का तमगा हासिल है। प्रधानमन्त्री श्री नरेंद्र मोदी के इस पवित्र कृत्य से देश की आम जनमानस की भाषा हिन्दी अब सामंतवादी भाषा अंग्रेजी को पटखनी देने की स्थिति में आ गई है।
     राष्ट्रीय स्वराज परिषद न केवल संविधान में संशोधन करके हिन्दी को राष्ट्रभाषा के रूप में घोषित करने के लिए दृढ़ संकल्पित है, बल्कि प्रत्येक हिन्दी राज्य/ राज्य क्षेत्र में किसी-न-किसी एक गैर हिन्दी भारतीय भाषा को द्वितीय राजभाषा के रूप में स्थापित करने की वकालत करता है। 
     हिन्दी भाषी राज्यों में गैर हिन्दी भारतीय भाषा को मान्यता देने के लिए संविधान के अनुच्छेद 345 में आवश्यक संशोधन करने की भी आवश्यकता है, क्योंकि इसका वर्तमान प्रावधान हिन्दी भाषी राज्यों में गैर हिन्दी भारतीय भाषा को स्वीकार करने में बाधा पैदा करता है। इस बाधा को समाप्त करके निम्न तालिका के अनुसार हिन्दी भाषी राज्यों में गैर हिन्दी भाषा को स्थापित चाहिए-

हिंदी भाषी राज्य       द्वितीय राजकीय भाषा   
1. राजस्थान                        उड़िया
2. उत्तर प्रदेश (पूर्वी क्षेत्र)       तमिल
3. उत्तर प्रदेश (मध्य क्षेत्र)        तेलुगू
4. उत्तर प्रदेश (पश्चिमी क्षेत्र)    मराठी
5. मध्य प्रदेश (पूर्वी क्षेत्र)       कश्मीरी
6. मध्य प्रदेश (पश्चिमी क्षेत्र)     पंजाबी
7. हरियाणा                   असमिया
8. छत्तीसगढ़                 मलयालम
9. बिहार                      कन्नड़
10. झारखंड                गुजराती
11. हिमाचल प्रदेश          मणिपुर
12. उत्तराखंड                  कोंकणी
13. दिल्ली                     बंगला
14. गैर हिन्दी राज्य         हिन्दी
    उक्त अभियान को मूर्त रूप देने के उद्देश्य से राष्ट्रीय स्वराज परिषद द्वारा 'सर्वोदय भारतीय भाषा मुहिम' के अन्तर्गत यह निर्णय लिया गया है कि प्रत्येक वर्ष 13 सितंबर को, जिस दिन डां. श्यामा प्रसाद मुखर्जी द्वारा संविधान सभा में भारतीय भाषाओं को स्थापित करने का संकल्प व्यक्त किया गया था, को 'भारतीय भाषा दिवस' मनाया जाए, ताकि हिन्दी को देश की राष्ट्रभाषा के रूप में संवैधानिक मान्यता मिलने के साथ-साथ गैर हिन्दी भारतीय भाषाओं को हिन्दी भाषी राज्यों में प्रोत्साहित एवं स्थापित किया जा सके।

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