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मिशन अनुच्छेद 44 : एक राष्ट्र, एक सिविल कानून (Mission Article 44 : One Nation, One Civil Law)

संविधान के अनुच्छेद 44 में कहा गया है कि देश के लिए समान नागरिक संहिता बनाकर लागू किया जाएगा। संविधान निर्माताओं की मंशा थी कि अलग-अलग धर्म के लिए अलग-अलग कानूनों को समाप्त किया जाए और सभी भारतीयों के लिए एक सर्वमान्य धर्मनिरपेक्ष एवं लिंगनिरपेक्ष सिविल संहिता बनकर लागू हो।

अनुच्छेद 44 के पक्ष में संविधान निर्माताओं द्वारा व्यक्त किए गए विचार :-

    व्यवहारिक रूप से इस देश में एक सिविल संहिता है, जिस के प्रावधान सर्वमान्य हैं और एकसमान रूप से पूरे देश पर लागू है। जिस क्षेत्र में यूनिफॉर्म सिविल कानून लागू नहीं होता है वह विवाह और उत्तराधिकार का क्षेत्र है। यह एक छोटा सा क्षेत्र है, जिस पर हम समान कानून नहीं बना सके हैं और यह इच्छा है कि अनुच्छेद 44 को संविधान का भाग बनाकर बदलाव लाया जाए।
     यह आवश्यक नहीं है कि कानून जैसे किराएदार के कानून या उत्तराधिकार के कानून धर्म द्वारा संचालित हो। यूरोप में ईसाइयत है, लेकिन ईसाइयत का अर्थ यह नहीं होता है कि ईसाई पूरे विश्व या यूरोप में जहां भी रहते हैं, उत्तराधिकार के समान व्यवस्था रखेंगे। ऐसी किसी चीज का अस्तित्व नहीं होता है। मैं व्यक्तिगत रूप से नहीं समझता हूं कि धर्म को इतना विस्तृत और व्यापक क्षेत्र क्यों दिया जाना चाहिए, जो संपूर्ण जीवन पर कब्जा कर ले और विधायिका को इन क्षेत्रों में हस्तक्षेप करने से रोके।...
- डॉ बी. आर. अंबेडकर (संविधान सभा में)

     हम सब एक प्रगतिशील समाज हैं। हम सब इस दौर में हैं, जहां धार्मिक क्रियाकलापों में हस्तक्षेप किए बिना हमें देश को अवश्य ही एकीकृत करना चाहिए। यदि बीते दिनों में धार्मिक क्रियाकलाप ने जीवन के सभी क्षेत्रों को अपने दायरे में ले लिया है, हमें ऐसा करने से मना करने का निर्णय लेना पड़ेगा और कहना होगा कि ये मामले धार्मिक नहीं है, ये पूरी तरह धर्मनिरपेक्ष कानून के विषय हैं। इसी बात पर यह अनुच्छेद बल देता है।
     एक महत्वपूर्ण विचार जो हमें अपने दिमाग में रखना है और मैं अपने मुस्लिम मित्रों को अहसास कराना चाहता हूं कि जितना ही जल्दी हम जीवन के पृथक्करणीय दृष्टिकोण को भूल जाएंगे, देश के लिए उतना ही अच्छा होगा। धर्म उस परिधि तक सीमित होना चाहिए, जो नियमत: धर्म की तरह दिखता है और बाकी जीवन इस तरह से विनियमित, एकीकृत और संशोधित होना चाहिए कि हम जितनी जल्दी संभव हो, एक मजबूत और एकीकृत राष्ट्र के रूप में निखर सकें।.... 
- श्री के. एम. मुंशी (संविधान सभा में)

     यह भी आपत्ति है कि यदि एक यूनिफॉर्म सिविल संहिता बन जाएगा तो धर्म खतरे में होगा और समुदाय मैत्रियता के साथ नहीं रह सकते हैं। इस अनुच्छेद का उद्देश्य ही मैत्रियता लाना है। यह मैत्रियता को समाप्त नहीं करता है। विचार यह है कि उत्तराधिकार या अन्य मामलों में पृथक व्यवस्थाएं ऐसे कारक है, जो भारत के तमाम लोगों में भिन्नता पैदा करता है। इसका उद्देश्य है कि ऐसे मामलों में एक समान सहमति तक पहुंचने का प्रयास किया जाए।
    जब ब्रिटिश देश की सत्ता पर काबिज हुए, तो उन्होंने कहा कि हम इस देश में सभी नागरिकों चाहे अंग्रेज हों या हिंदू हों या मुस्लिम हों, पर समान रूप से लागू होने वाले एक आपराधिक कानून को लागू करने जा रहे हैं। क्या तब मुस्लिम अपवाद बने रह पाए थे और क्या वे आपराधिक कानून की एक व्यवस्था को लागू करने के लिए ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ विद्रोह कर सके थे?
    इसी तरह हमारे पास संविदा कानून है, जो मुसलमान और हिंदू के बीच या मुसलमान और मुसलमान के बीच होने वाले अंतरण पर लागू होता है। वे कुरान के कानून द्वारा नहीं, बल्कि निरपवाद रूप से एंग्लो-इंडियन विधिशास्त्र द्वारा संचालित होते हैं। इसी तरह अंतरण के कानून में तमाम सिद्धांत ऐसे हैं जो इंग्लिश विधिशास्त्र से लिए गए हैं।....
- श्री अल्लादी कृष्णा स्वामी अय्यर (संविधान सभा में) 

सुप्रीम कोर्ट द्वारा समय-समय पर व्यक्त किए गए विचार:-
     यह भी दु:ख का विषय है कि हमारे संविधान का अनुच्छेद 44 मृत अक्षर बनकर रह गया है। यह प्रावधानित करता है कि 'राज्य नागरिकों के लिए यूनिफॉर्म सिविल संहिता प्राप्त करने का प्रयास करेगा।' कॉमन सिविल संहिता को बनाने के लिए राज्य स्तर पर प्रयास किए जाने का कोई साक्ष्य नहीं है।... कॉमन सिविल संहिता विरोधाभासी विचारों वाले कानूनों के प्रति पृथक्करणीय भाव को समाप्त कर राष्ट्रीय अखंडता के लक्ष्य को प्राप्त करने में सहयोग करेगा।
- न्यायमूर्ति वाई. वी. चंद्रचूड़ ( शाहबानो बेगम के मामले में,1985)

     यह एक आश्चर्य है कि संविधान के अनुच्छेद 44 के अंतर्गत व्यक्त की गई संविधान निर्माताओं की इच्छा को पूरा करने में सरकार और कितना समय लेगी। उत्तराधिकार और विवाह को संचालित करने वाले परंपरागत हिंदू कानून को बहुत पहले ही 1955-56 में संहिताकरण करके अलविदा कर दिया गया है। देश में यूनिफॉर्म सिविल संहिता को अनिश्चितकाल के लिए निलंबित करने का कोई औचित्य नहीं है।
- न्यायमूर्ति कुलदीप सिंह ( सरला मुद्गल के मामले में, 1995)

    धार्मिक प्रथाएं मानवाधिकार एवं गरिमा का अतिक्रमण करते हैं। धर्म के नाम पर सिविल एवं भौतिक आजादी का गला घोटना स्वराज्य नहीं बल्कि निर्दयता है। इसलिए यूनिफाइड संहिता का होना निर्दयता से सुरक्षा प्रदान करने और राष्ट्रीय एकता एवं सौहार्द को प्रोत्साहित करने के लिए बाध्यकारी है। 
- न्यायमूर्ति आर. एम. सहाय ( सरला मुद्गल के मामले में, 1995)

    यह एक दुख की बात है कि संविधान के अनुच्छेद 44 को आज तक लागू नहीं किया जा सका है। संसद को अभी भी देश में कॉमन सिविल संहिता का निर्माण करने के लिए कदम उठाना है। कॉमन सिविल संहिता वैचारिक मतभेदों को दूर कर अखंडता को हासिल करने में सहायक होगा।
- न्यायमूर्ति वी. एन. खरे ( जॉन वलामत्तम के मामले में, 2003)

     हम भारत सरकार को निर्देशित करते हैं कि वह उचित विधान बनाने पर विचार करें, खासतौर पर 'तलाक-ए-विद्दत' के संदर्भ में। हम आशा एवं अपेक्षा करते हैं कि आने वाला यह विधान व्यक्तिगत कानून - शरीयत में हुए सुधारों, जैसा कि वैश्विक पटल पर, यहां तक कि इस्लामिक धर्म आधारित देशों में भी कानूनों के माध्यम से किया गया है, पर भी विचार करेगा। जब भारत में ब्रिटिश सरकार द्वारा कानून के माध्यम से मुस्लिम को परेशानी में सहयोग किया गया है और जब मुस्लिम समुदाय द्वारा उपचारात्मक उपाय अपनाया गया है, तो स्वतन्त्र भारत में पीछे रह जाने का हम कोई कारण नहीं पाते हैं।
- न्यायमूर्ति जे. एस. खेहर एवं न्यायमूर्ति एस. अब्दुल नजीर ( शायरा बानो के मामले में, 2017)

समान नागरिक संहिता पर राजनीतिक विद्वानों के विचार

     एक ही विषय पर हिंदू के लिए एक कानून, मुस्लिम और ईसाई के लिए अलग-अलग कानून, धर्मनिरपेक्ष एवं लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ और देश की एकता व अखंडता के लिए खतरनाक है। 
- डॉ राम मनोहर लोहिया (समान नागरिक संहिता के पक्ष में उनके द्वारा चलाए गए अभियान के दौरान)

     मेरी समझ में नहीं आ रहा है, जब संविधान के निर्माताओं ने शादी-विवाह के लिए एक कानून बनाने की सिफारिश की है और कहा है कि राज्य इसकी तरफ ध्यान देगा, तो क्या वे साम्प्रदायिक कारणों से पीड़ित थे, क्या ये संप्रदायिकता मुद्दा है? क्रिमिनल लॉ एक है। सिविल लॉ क्यों नहीं एक हो सकता है? अभी भी सिविल लॉ एक है।
- अटल बिहारी वाजपेई, पूर्व प्रधानमंत्री

    यदि आप किसी तरह का हस्तक्षेप नहीं चाहते हैं तो इसे व्यक्तिगत बनाये रखें। यदि आप न्यायालय से शरीयत के अपने अधिकार को सुरक्षित करना चाहते हैं तो देखना पड़ेगा कि किसे सुरक्षित करने की मांग की जा रही है। इसलिए समान नागरिक संहिता के लिए आगे बढ़े।  
- मोहम्मद आरिफ खां, राजनीतिक विचारक

     अपनी परंपरागत व्यक्तिगत कानून के लिए छूट पाने हेतु राज्य विधायिका के क्षेत्राधिकार से सुरक्षित किए जाने के लिए धार्मिक और राजनीतिक दबाव का प्रयास करने में ऊर्जा खर्च करने के बजाय मुसलमान इसका अविष्कार एवं प्रदर्शन करके अच्छा कर पाएगा कि कालदोषयुक्त एवं उनकी घिसी पिटी व्याख्या से दोषमार्जित सच्चा इस्लामिक कानून कैसे भारत में समान नागरिक संहिता को और ज्यादा मूल्यवान बना सकता है।
- डॉक्टर ताहिर महमूद (मुस्लिम पर्सनल लॉ, पृष्ठ संख्या 200) 

    भारत में विद्यमान धर्म आधारित अलग-अलग व्यक्तिगत कानून, इस देश के धर्म-आधारित विभाजन के बुझ चुके आग में सुलगते धुआं की तरह हैं, जो कभी भी विस्फोटक होकर देश की एकता को खण्डित कर सकते हैं। इसलिए इन्हें समाप्त कर समान नागरिक संहिता बनाना न केवल देश की धर्मनिरपेक्षता को बनाए रखने के लिए, बल्कि इसकी एकता व अखण्डता को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए अति आवश्यक है। किन्तु दुर्भाग्य से समान नागरिक संहिता के विषय को हमेशा धार्मिक तुष्टिकरण के चश्मे से देखा जाता रहा है। पिछले 70 वर्षों के दौरान इस दिशा में ईमानदारी से कोई कदम नहीं उठाया जा सका।

      समान नागरिक संहिता के निर्माण के लिए राष्ट्रीय स्वराज परिषद द्वारा 'मिशन अनुच्छेद 44 एक राष्ट्र, एक सिविल कानून' चलाया जा रहा है। मिशन के अंतर्गत समय-समय पर सेमिनार  एवं पुस्तिकाओं के माध्यम से जन जागरूकता किया जा रहा है। इस दिशा में मिशन आर्टिकल 44 : एक राष्ट्र, एक सिविल कानून' के संयोजक श्री अनूप सर्वोदय द्वारा लिखित पुस्तकें - 'भारतीय सिविल संहिता के सिद्धांत : अनुच्छेद 44 के क्रियान्वयन के अनुक्रम में', 'भारत में तीन तलाक की चुनौती', 'समान नागरिक संहिता आवश्यक क्यों', 'समान नागरिक संहिता का ब्लूप्रिंट', 'समान नागरिक संहिता पर विधि आयोग की नकारात्मकता' इत्यादि महत्वपूर्ण है।

     समान नागरिक संहिता का निर्माण कर लागू करने के लिए 'मिशन अनुच्छेद 44 : एक राष्ट्र, एक सिविल कानून' का प्रतिनिधिण्डल डॉ. बीएस चौहान की अध्यक्षता वाले विधि आयोग के साथ बैठक भी की है। इस बैठक में मिशन द्वारा विधि आयोग से उन बिंदुओं पर विस्तार से चर्चा किया गया, जिनके आधार पर समान नागरिक संहिता बनाया जा सकता है और जिन्हें लेकर विधि आयोग असमंजस में था। किन्तु समान नागरिक संहिता के लिए सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह है कि भारतीय जनता पार्टी, जो खुलकर इसका समर्थन करने वाली पार्टी है, उसी के शासनकाल में और उसी के नाक के नीचे विधि आयोग जब समान नागरिक संहिता के खिलाफ 31 अगस्त 2018 को रिपोर्ट देता है, तो सरकार का कोई भी नुमाइंदा सामने आकर विधि आयोग के इस रिपोर्ट का विरोध नहीं कर पाता है।

      समान नागरिक संहिता बनने से होने वाले प्रमुख सुधार एवं लाभ -

1. देश को सैकड़ों कानूनों और इनकी जटिलता से मुक्ति मिलेगी।

2. इनमें से ज्यादातर कानून ब्रिटिश हुकूमत के दौर के बने हुए हैं। ये कानून गुलामी के प्रतीक हैं। ऐसे कानूनों से दीर्घ अवधि तक संचालित होने से हीनभावना पैदा होती है। समान नागरिक संहिता बनने से ऐसी हीनभावना से हम मुक्त हो सकेंगे।

3. कुछ अपवादों को छोड़कर 'एक पति-एक पत्नी' की अवधारणा सभी भारतीयों पर समान रूप से लागू होगा। अपवादों का लाभ सभी भारतीयों को, चाहे वह पुरुष हो या महिला, हिंदू हो या मुसलमान या सिख या इसाई को समान रूप से मिलेगा।

4. न्यायालय के माध्यम से विवाह-विच्छेद करने का सामान्य नियम लागू होगा। किन्तु विशेष परिस्थितियों में मौखिक तरीके से विवाह विच्छेद करने की आजादी भी होगी, जो सभी भारतीयों को, चाहे वह पुरुष हो या महिला, हिंदू हो या मुसलमान या सिख या इसाई को समान रूप से मिलेगा।

5. पैतृक संपत्ति में पुत्र एवं पुत्री को समान अधिकार प्राप्त होगा। इसको लेकर धर्म आधारित विसंगतियां समाप्त होगा‌।

6. विवाह-विच्छेद की स्थिति में विवाहोपरांत अर्जित संपत्ति में पति और पत्नी को समान अधिकार प्राप्त होगा।

7. वसीयत, दान, धर्मजत्व, संरक्षकत्व, बंटवारा, गोद इत्यादि के संबंध में सभी भारतीयों पर समान कानून लागू होगा और धर्म-आधारित विसंगतियां समाप्त होगा।

8. देश को राष्ट्रीयता के संबंध में एक समग्र एवं एकीकृत कानून मिल सकेगा।

9. धर्म के आधार पर अलग अलग कानून होने से पैदा होने वाली अलगाववादी मानसिकता समाप्त होगा और एक एवं अखण्ड राष्ट्र के निर्माण की दिशा में हम आगे बढ़ सकेंगे।

10. अलग-अलग धर्मों के लिए अलग-अलग कानून होने के कारण इस देश को अनावश्यक मुकदमेबाजी में उलझना पड़ता है। समान नागरिक संहिता होने से न्यायालय का समय बचेगा और मुकदमेबाजी समाप्त होगा।

11. मूलभूत धार्मिक अधिकार जैसे पूजा/नमाज/प्रार्थना करने या ब्रत/रोजा रखने या मन्दिर/मस्जिद/चर्च/गुरुद्वारा का प्रबंधन करने या संविधान प्रदत्त धार्मिक शिक्षा के अधिकार में या विवाह या निकाह का कोई भी पद्धति अपनाने में या मृत्यु के पश्चात अंतिम संस्कार के लिए कोई भी तरीका अपनाने में किसी तरह का बाधा या हस्तक्षेप नहीं होगा।

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