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चुनाव आयुक्त के चयन को लेकर हुई केन्द्रीय समिति की बैठक मेंं विपक्ष के नेता राहुल गांधी, गुणवत्ता पर कोई विमर्श करने के बजाय यह आपत्ति की कि चयन प्रक्रिया को लेकर मामला सुप्रीम कोर्ट के समक्ष विचाराधीन है, इसलिए बैठक को टाल दिया जाए।
चुनाव आयुक्त की नियुक्ति को पारदर्शी बनाने के लिए हमारे संविधान-निर्माताओं ने संसद से एक कानून बनाने की अपेक्षा की थी और इसके लिए अनुच्छेद 324 में प्रावधान बनाया। इस अनुच्छेद पर बहस के दौरान एक तंत्र बनाये जाने की आवश्यकता पर बल देते हुए डॉ. भीमराव आम्बेडकर ने कहा था कि कार्यपालिका के अंगूठे के अधीन व्यक्ति को नियुक्त होने से रोकने के लिए पर्याप्त प्रावधान न होना संविधान सभा को बहुत सरदर्द दे रहा है। किन्तु चूंकि तब ऐसे किसी तंत्र का कोई मसौदा तैयार नहीं किया जा सका, इसलिए इसे भावी संसद पर कानून बनाकर लागू करने के लिए छोड़ दिया गया। इसे लेकर जस्टिस तारकुण्डे समिति (1975), दिनेश गोस्वामी समिति (1990), द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग (2009) ने अपनी संस्तुति प्रस्तुत की। विपक्ष का नेता रहते हुए लालकृष्ण आडवानी ने भी केवल प्रधानमंत्री की संस्तुति वाली व्यवस्था पर कई बार आपत्ति की। इन सबके बावजूद तत्कालीन कांग्रेस सरकारों द्वारा 1951 से 2013 तक कोई कानून नहीं बनाया गया।
सम्यक कानून बनाने को लेकर लेखक द्वारा दाखिल जनहित याचिका संख्या 104/2015 में सुप्रीम कोर्ट ने एक समिति के गठन का निर्णय दिनांक 02.03.2023 दिया। इस समिति की संस्तुति पर मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्त की नियुक्ति की जाती, जिसमें प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश शामिल किए गए थे। यह समिति संसद द्वारा कानून बनाए जाने तक कार्य करती। इसके बाद केन्द्र सरकार की पहल पर संसद द्वारा मुख्य चुनाव आयुक्त एवं अन्य चुनाव आयुक्त नियुक्ति अधिनियम, 2023 पारित किया गया। इस कानून के अन्तर्गत संस्तुति करने वाली समिति में प्रधानमंत्री और विपक्ष के नेता के साथ एक कैबिनेट मंत्री को भी शामिल किया गया है। अब इस कानून को कुछ जनहित याचिकाओं के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट के समक्ष मुख्यत: इस आधार पर चुनौती दी गई है कि यह अनूप बरनवाल मामले में संविधान पीठ द्वारा दिए गए निर्णय का उल्लंघन करता है। सुप्रीम कोर्ट ने 2023 के चुनाव आयुक्त नियुक्ति कानून के विरुद्ध कोई अन्तरिम राहत देने से मना कर दिया।
कुछ महत्त्वपूर्ण एवं गम्भीर सवाल निकलकर आते है। जैसे, क्या 2023 का कानून पारित करते समय संसद ने ऐसा कुछ किया है, जो संविधान के प्रतिकूल है; क्या समिति में केवल मुख्य न्यायाधीश को शामिल करके ही इसे निष्पक्ष बनाया जा सकता है; और क्या चुनाव आयुक्त की नियुक्ति का कार्य एक कार्यपालिकीय कार्य है और यदि ऐसा है, तो इस कार्य में मुख्य न्यायाधीश को किस सीमा तक हस्तक्षेप करने की छूट दी जानी चाहिए?
भारतीय संविधान के अन्तर्गत कार्यपालिका और विधायिका जैसी राजनैतिक संस्थाओं की नियुक्ति के लिए जनता द्वारा चुनाव की व्यवस्था अपनायी गई है, और इसलिए इनकी जवाबदेही जनता के प्रति रहती है। न्यायपालिका या चुनाव आयोग जैसी गैर-राजनीतिक संवैधानिक संस्थाओं की नियुक्ति के लिए चुनाव जैसी कोई व्यवस्था नहीं अपनाकर इन्हें अपने कार्यों को लेकर जनता के प्रति जवाबदेह नहीं बनाया गया और केवल स्वयं की अन्तरात्मा के प्रति एक संवैधानिक-नैतिकता वाली जिम्मेदारी दी गई है। इनकी नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा किए जाने की व्यवस्था अपनाया गया। संसदीय प्रणाली में इसका अर्थ है कि राष्ट्रपति प्रधानमंत्री की सलाह पर नियुक्ति करेगा। किन्तु सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के न्यायाधीश के सम्बन्ध में मुख्य न्यायाधीश से सलाह लेने का, और चुनाव आयोग के सम्बन्ध में अनुच्छेद 324 के अन्तर्गत एक सम्यक कानून बनाने का शर्त भी लगाया गया है।
1993 में कोलेजियम का आविष्कार होने के पूर्व न्यायाधीशों की नियुक्ति में किस स्तर पर पार्टीगत हस्तक्षेप रहा है, इसे राजनीतिज्ञ एवं न्यायाधीश बहरुल इस्लाम की नियुक्ति के दृष्टान्त से समझा जा सकता है। बहरुल इस्लाम 1962 में कांग्रेस पार्टी से राज्य सभा सदस्य चुने गए थे। इस पद से उन्होंने 20.01.1972 को इस्तीफा दे दिया और इसी दिन उन्हें गोवाहाटी हाईकोर्ट का जज बना दिया गया। यहां वे मुख्य न्यायाधीश रहते हुए 01.03.1980 को सेवानिवृत्त हो गए। सेवानिवृत्त के नौ महीने बाद 04.12.1980 को उन्हें सुप्रीम कोर्ट का न्यायाधीश बना दिया गया। किन्तु सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश पद से सेवानिवृत्त होने से करीब दो महीने पूर्व उन्होंने इस्तीफा दे दिया, ताकि वह बारपेटा लोकसभा सीट से चुनाव लड़ सके। चुनाव टल जाने के बाद कांग्रेस पार्टी ने उन्हें 15 जून, 1983 को पुन: राज्यसभा का सदस्य बना दिया। किसी भी संस्था के लिए, उसके सर्वोच्च संवैधानिक पद की नियुक्ति में इतना मनमाना रवैया चिन्ता का विषय हो सकता है। सुप्रीम कोर्ट खुद को इस चिन्ता से अलग नहीं कर सकता था। कोलेजियम जैसे तंत्र का आविष्कार इसी चिंता को दूर करने के लिए किया गया एक प्रयास है। इसका उद्देश्य है कि संस्तुति केवल मुख्य न्यायाधीश द्वारा नहीं बल्कि इसके साथ चार अन्य वरिष्ठ न्यायाधीशों वाली कोलेजियम द्वारा सामूहिकता के सिद्धान्त के आधार पर किया जाए और कोई नियुक्ति ऐसी संस्तुति के बाद ही की जाए। 2023 के कानून में भी कमोवेश यही किया गया है। कहीं और बेहतर किया गया है। प्रधानमंत्री और एक कैबिनेट मंत्री के अलावा विपक्ष के नेता को भी रखा गया है। प्रधानमंत्री और कैबिनेट मंत्री लोकसभा के प्रति उत्तरदायी हैं, तो विपक्ष के नेता लोकसभा के एक बड़े धड़े का प्रतिनिधित्व करता है। बेशक मुख्य न्यायाधीश न्यायपालिका का सर्वोच्च होने के नाते अति महत्त्वपूर्ण है, किन्तु यह महत्त्व न्यायपालिका के लिए निर्धारित कार्यों को लेकर ही सीमित है। स्थापित विधिशास्त्र के अन्तर्गत नियुक्ति सम्बन्धी कार्य, एक कार्यपालिकीय दायित्व वाला कार्य है। इसमें, वह भी दूसरी समान महत्त्व की संस्थाओं में नियुक्ति करने सम्बन्धी कार्य में, मुख्य न्यायाधीश को शामिल करना, उसे अनावश्यक रूप से विवाद में घसीटने जैसा है। इसे खुद न्यायपालिका की गरिमा के अनुकूल नहीं कहा जा सकता है।
2023 का कानून संवैधानिक सुधार की दिशा में अति-महत्त्वपूर्ण कदम है। इसमें स्वीकृत सामूहिकता के सिद्धान्त को न केवल चुनाव आयुक्त पद पर बल्कि सुप्रीम कोर्ट एवं हाई कोर्ट के न्यायाधीश पद पर नियुक्ति के सन्दर्भ में लागू किए जाने की, और इस कानून को और बेहतर एवं व्यापक बनाने की आवश्यकता है। चयन-प्रक्रिया की गुणवत्ता को बढ़ाने के लिए सम्बन्धित संवैधानिक संस्था के मुखिया को भी समिति में शामिल किया जाना चाहिए। जैसे, न्यायाधीश की नियुक्ति हेतु संस्तुति करने वाली समिति में प्रधानमंत्री और विपक्ष के नेता के साथ मुख्य न्यायाधीश को और चुनाव आयुक्त की नियुक्ति हेतु संस्तुति करने वाली समिति में प्रधानमंत्री और विपक्ष के नेता के साथ मुख्य चुनाव आयुक्त को शामिल किया जा सकता है। मुख्य न्यायाधीश और मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति सबसे वरिष्ठ की प्रोन्नति करके करने का प्रावधान बनाया जाना चाहिए। समिति को ‘संविधान-स्तरीय संस्तुति परिषद’ नाम देकर इसे संवैधानिक संस्था बनाया जा सकता है। ऐसा ही एक प्रयास मोदी सरकार द्वारा 2014 में ‘राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग’ बनाकर किया गया था, किन्तु इसे स्वयं सुप्रीम कोर्ट ने निरस्त कर दिया। सवाल है कि सुप्रीम कोर्ट जो सुधार चुनाव आयोग के लिए चाहता है, उसे स्वयं पर लागू करने से पीछे क्यों हो जाता है?
केन्द्रीय समिति की बैठक में राहुल गांधी, चयन की गुणवत्ता के सम्बन्ध में अपना रचनामक योगदान दे सकते थे, किन्तु इसके बजाए वह तकनीकी आपत्ति करके अपनी मुख्य जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया। संवैधानिक पद पर नियुक्ति के सम्बन्ध में विपक्ष के नेता से ऐसे रवैये की अपेक्षा नहीं की जा सकती है, जबकि उन्हें पता है कि मुख्य चुनाव आयुक्त जैसे संवेदनशील पद को खाली रखना अनुचित है, और इसको लेकर लागू कानून पर रोक लगाने से खुद सुप्रीम कोर्ट ने मना कर दिया है।
- अनूप बरनवाल देशबन्धु,
अधिवक्ता, इलाहाबाद उच्च न्यायालय, प्रयागराज
लेखक, भारतीय संविधान की निर्माण यात्रा